मैं न सुनाई दूं, न दिखाई दूं,
फिर भी मैं साथ तुम्हारे हूँ,
हर हाल में मैं तो साथ चलूँ,
फिर क्यूँ तुमसे अनजानी हूँ,
बारिश की पहली बूँद हूँ मैं,
सूरज की पहली किरण हूँ मैं,
कभी तपती धुप में छाओं बनूँ,
कभी ठंडी हवा का झोंखा हूँ मैं.
कहते हैं दुनिया मुझसे है,
लेकिन मैं फिर भी तुमसे हूँ,
साथी न मुझको समझो तुम,
फिर भी मैं साथ तुम्हारा दूं,
जब भी कोई मुश्किल आ जाए,
चट्टान बनी मैं खड़ी रहूँ,
गर साथ न दो तुम कभी मेरा,
धरती पे टूट के बिखर पडूं,
क्यूँ नहीं समझते तुम मुझको,
न ही मेरे इन रूपों को,
जो साथ तुम्हारे बदलते हैं,
फिर भी तो साथ तुम्हारे हैं,
क्यूँ ढूँढा करते हो मुझको,
इस इंसान में, उस इंसान में,
कभी देखो अपना अंतर्मन,
रहती हूँ तुम्हारे अन्दर मैं,
गर समझो मुझको तुम अपना,
तो नाम तुम्हें बतलाती हूँ,
हर हाल में वफ़ा निभाती हूँ,
मैं तो उम्मीद कहलाती हूँ.
This was a quick sketch made on an A4 size paper with black pilot pen.
Didn't think of anything better with this poem.
I hope u all like it. Please give me your feed backs as they are important for any Artist to improve oneself and learn to be better next time.
Cheers!!

